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Saturday, October 23, 2021

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अन्नदाता ने सभी को एक कर दिया…….

प्रदीप दलाल की कलम से……
देश की मिट्टी की खुशबू ही अलग है। मिट्टी ही हम सब को एक दूसरे से जोड़ती है। जो धर्म और जातीय जहर कुर्सी के चंद कीड़ों ने सत्ता के लिए भरा। वह जहर अब धुलने लगा है। दरअसल हम कठपुतली की भूमिका में थे, जिसे नहीं पता कि उसको चलाने वाला क्या चाहता है लेकिन लोग उसे ही देखते हैं। देश भर में फैला धर्म, जाति, क्षेत्र का जहर परत दर परत फीका पड़ने लगा है। सभी धर्मों के लोग अपनी मिट्टी को बचाने की जो हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो चाहे देश के किसी भी क्षेत्र धर्म संस्कृति या जाति से हों। वे आज एक जगह एकत्रित हैं। वे सभी एक दूसरे को नहीं जानते लेकिन मिट्टी ने सबको एकता, भाईचारे और सद्भावना के ऐसे सूत्र में बांधा है। जिसने देश में लगातार घुलते धर्म जाति और क्षेत्रवाद के जहर की काट ढूंढ ली है। यहां सब एक हैं। सभी गरीब-अमीर एक साथ देश की मिट्टी पर बैठकर अन्न खा रहे हैं। उन्हें नहीं पता खाना राशन कहाँ से किस धर्म और किस जाति और किस क्षेत्र से आ रहा है। पंजाबी, हरियाणवी, राजस्थानी, महाराष्ट्र, यूपी समेत हर राज्य का अन्नदाता आपसी भेदभावों को भूल अपने हकों के लिए लड़ रहा है। हर किसी में एक दूसरे के प्रति सहयोग, समर्थन की भावना दिल को सुकून देने वाली है। देश के हर कोने से आए हुए लोग मिट्टी की खुशबू को ना केवल महसूस कर रहे हैं बल्कि पूरे देश के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं कि हम, हमारा समाज हर धर्म, समाज के लोग आज भी एक हैं। वह तो चंद कुर्सी के कीड़ों ने पूरे समाज को अपने नफे के लिए ढाल बना लिया। उनमें अपने फायदे के लिए हम भी शामिल हो बैठे और जाने अनजाने में अपने ही समाज और भाईचारे का कत्ल कर बैठे। अन्नदाता के आंदोलन ने सबकी अंतरात्मा को झकझोर दिया। जो आत्मा कबकी अपने फायदों के लिए मर चुकी थी। हमारा समाज कुर्सी का मोहरा बन धर्म और जातियों में बंट कर देश का भट्ठा बैठा देने को आमादा था। हम उन्मादी और मूर्ख बन बैठे थे। हमारे विचार और सोच मलीन हो गई थी। वो भड़काते और उकसाते रहे और हम कभी ना मिटने वाले जहर की फसल बोते रहे। जब फसल बोई तो गाहे बेगाहे काटी भी तो हमने, किस का क्या बिगड़ा। न नफा लेने वालों का ना ही भड़काने वालों का लेकिन समाज बस नाम का बचा। हम धर्म से जाति और जाति से गोत्र और गोत्र से गांव व परिवार को अलगाव के रास्ते पर चला बैठे। अब उस जहर को मिटते देख रहा हूँ। यह पल बेहद खुशनुमा हैं। सारा देश आज अन्नदाता के साथ खड़ा है। यह ऐतिहासिक है। अन्नदाता के आंदोलन से हम अपना भाईचारा और सामाजिक सद्भावना का ताना-बाना फिर से बुन रहे हैं। हरियाणवी पंजाबी को बड़ा भाई बता गले मिल रहे हैं। राजस्थानी और यूपी वाले संग बैठ रोटियां खा रहे हैं। आंदोलन का राशन हरियाणा के गांव गांव से जा रहा है। जहर अब धुंधला पड़ने लगा है। जहर फैलाने वाले पर्दे के पीछे से सारा माजरा देख और समझ रहे हैं। उनका बुना करिश्माई जाल परत दर परत खुलता जा रहा है। इस आंदोलन से अभी तक बहुत कुछ पा लिया सभी ने, अन्नदाता ने हर वर्ग का पेट हमेशा से भरा। आंदोलन के दौरान लाठियां भांजनी और ठंडा पानी फेंकने वाले पुलिस वालों को भी अन्नदाता ने अन्न खिला कर पूरे देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का दिल जीत लिया। हम सब एक हैं। एक खून, एक देश व संस्कार, अनेकता में एकता अब सही मायनों में जीवन्त हो उठी है। ईश्वर से प्रार्थना है इस एक देश, भाईचारे, सद्भावना को किसी की नजर न लगे और सभी अन्नदाता के आंदोलन से सबक लेकर संकल्प लें कि देश को एकता के सूत्र में पिरोना हमारा अपना दायित्व है किसी और का नहीं और जिस दिन हमने यह बात समझ ली। उस दिन हम देश और समाज में जहर घोलने वाले लोगों को सबक सिखाना शुरू कर देंगे और तभी से जहर की यह खेती बंद हो सकती है।जब सभी और भाईचारा, सामाजिक सद्भाव और खुशहाली होगी तभी हमारे देश का नवनिर्माण होगा और हम नई बुलन्दियों पर होंगे
जय हिंद-जय भारत

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