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Saturday, December 4, 2021

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अन्नदाता है देश का असली हीरो…..

प्रदीप दलाल की कलम से………

देश का अन्नदाता अपनी धरती को बचाने के लिए कंपकपाती और जमा देने वाली सर्दी के मौसम में पिछले कई दिनों से सड़कों पर सोने को मजबूर है। सत्ता इतनी भी संवेदनशील नहीं है की समस्या के समाधान की ओर बढ़े। तारीखों पर तारीखें तय की जा रही हैं और दूसरी तरफ हर प्रदेश से आए किसान बच्चे से लेकर वृद्ध तक और महिलाओं से लेकर बड़ी बुजुर्ग महिलाओं तक इस कंपकपाती ठंड में सड़कों पर है। शायद बुलंद इरादों की गर्मी ने उन्हें ठंड से बचा रखा है। इस बीच जहां अन्नदाता ने शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल में आंदोलन चलाया है और देश के सामने अन्नदाता का मानवीय पहलू रखा है दूसरी तरफ देश के कुछ स्वार्थी लोगों का क्रूर चेहरा भी जगजाहिर हुआ है। चाहे सत्ता पक्ष और विपक्ष हो जो अन्नदाता के मुद्दे पर संवेदनशील नजर नहीं आता। चाहे मीडिया हो जो निष्पक्ष और ईमानदार नजर नही आता और चाहे देश के बड़े सिनेमा एक्टर, क्रिकेट खिलाड़ी, बड़े बिजनेसमैन, कथित बुद्धिजीवी वर्ग और हर छोटी बड़ी घटना पर चीखने वाला मानवाधिकार आयोग। दरअसल इन लोगों की कोई औकात नहीं है बल्कि देश के लोग ही इन लोगों को बड़ा बनाने वाले हैं लेकिन आज अन्नदाता के आंदोलन ने इन सभी के क्रूर चेहरे को जगजाहिर कर दिया है। यह लोग सितारे कैसे हो सकते हैं। जो अन्नदाता के मानवीय पहलू को नहीं समझ पाए। नेताओं के पीछे जयकारे लगाता झुंड हो या रैलियों में भीड़ एकत्रित करना उसमें बड़ी भूमिका किसान की रहती थी लेकिन हर पार्टी से जुड़े किसान को किसी भी नेता का उसके मुश्किल भरे समय में उतना समर्थन नहीं मिला। जितनी उनको आशा थी। बस किसान को तो हर बार मोहरा बनाया गया चुनावो में, अन्नदाता किसान को आजादी से अब तक सिवाय घोषणा पत्रों के कुछ नहीं मिला। सरकारे चाहे जो भी रही हों लेकिन आजादी से आज तक देश का किसान अगर आत्महत्या करने को मजबूर है तो इसका सीधा सीधा जिम्मेदार कुर्सी पर बैठने वाले वे चंद लोग हैं। जो हर बार घोषणाएं तो करते हैं लेकिन वे घोषणाएं कुर्सी पर बैठते ही कहीं-कहीं छूमंतर हो जाती हैं। देश के भाग्य विधाता अन्नदाता किसान को अपना ही भाग्य खुलने का इंतजार है लेकिन सत्ता की असंवेदनशीलता दर्शाती है कि चुनाव पास नहीं है और अगर चुनाव पास नहीं है तो बेशक लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर जमा देने वाली ठंड में डेरा जमाए रखें लेकिन सत्ता के कानों पर जूं नहीं रेंगेगी। जिन लोगों ने सिनेमाघरों की टिकटें खरीद खरीद कर और टेलीविजन पर देख देख कर नाचने गाने वालों को स्टार बना दिया। अब वह स्टार भी कहीं नजर नहीं आता लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे लोग कभी स्टार थे ही नहीं क्योंकि देश का असली स्टार तो अन्नदाता ही है जो पूरे देश का पेट भरता है और अपने बच्चों को देश की रक्षा के लिए सरहदों पर भेजता है। अगर यह लोग क्रिकेट नहीं देखते तो क्या वे क्रिकेट वाले स्टार बन पाते लेकिन आज हर जगह घनघोर चुप्पी दर्शाती है कि सत्ता और पैसा ही सब कुछ है। कथित बुद्धिजीवी जो छोटी-छोटी बातों को चीख चीख कर बड़ा बना देने में माहिर होते हैं। वे कहीं दूर दूर तक नजर नहीं आ रहे। वे लोग धर्म और जाति की सियासत पर रोटियां जरूर सेंक सकते हैं लेकिन जब बात आज अन्नदाता के अधिकारों की आई है तो उन्हें इतनी तक समझ नहीं है कि वे तीन समय का भोजन जब करते हैं तो कम से कम उस अन्न का सम्मान तो कर सकें। अब जब अन्न दाता अपने अधिकारों को लेकर सजग हो चुका है तो अन्नदाता को यह भी जान लेना चाहिए कि कौन उसके अपने हैं और कौन पराए। किसानों के मसीहा सर छोटूराम ने भी कहा था कि ऐ भोले किसान मेरी दो बातें मान ले- एक तो बोलना सीख ले और दूसरा दुश्मन पहचान ले। किसानों के लिए इन दोनों बातों को आत्मसात करने का इससे बेहतर समय शायद ही कभी जीवन में दोबारा आए क्योंकि यह वह वक्त है जब सब रजाई में दुबकने को मजबूर हैं लेकिन अन्नदाता सड़कों पर है और सत्ता और विपक्ष असंवेदनशीलता की बड़ी इबारत लिखते जा रहे हैं। जिसे देश हमेशा याद रखेगा और याद रखेगा कि सोई सत्ता को जगाने के लिए आजादी से पहले भी सीखना पड़ता था और अब भी सीखना पड़ता है। सत्ता तब भी गूंगी और बहरी थी और अब भी। किसान पहले भी जिस स्थिति में थे वर्तमान में भी वही स्थिति है। आख़िर बदला ही क्या है। बेशक हम मंगल पर चले गए हों लेकिन देश के अन्नदाता का मंगल नहीं हुआ…….

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