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Saturday, July 31, 2021

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आत्मसंतुष्टि और खुशी का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत….

प्रदीप दलाल की कलम से
कई लोगों को अपने जीवन से बड़ी शिकायत सी रहती है कि उन्हें यह नहीं मिला। उन्हें वह नहीं मिला और आखिर उन्हें मिला ही क्या है। कई बार लोग ऐसा सोचते चले जाते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि जितना उन्हें मिला है। वह बहुत से लोगों का ख्वाब भर ही तो है। बहुत से लोगों के लिए उतना किसी सपने के पूरा होने जैसा है। दरअसल जब हमें उम्मीद से ज्यादा मिलता चला जाता है तो हम वही नहीं रुकना चाहते बल्कि और अधिक और उससे भी अधिक की उम्मीद की लालसा में अपनी हंसती-खेलती जिंदगी को ही सवालों के कठघरे में ला खड़ा करते हैं। जितना है पर्याप्त है के सिद्धांत पर कोई चलना नहीं चाहता। वही असली संतुष्टि और खुशी का सिद्धांत है।
मनोविज्ञान के अनुसार सभी के लिए खुशी का पैमाना अलग-अलग होता है लेकिन सबसे अधिक खुशी संतुष्टि भाव से होती है । हमारे जीन 100 में से 50% तक हमारी खुशी का निर्धारण करते हैं। दूसरी ओर, 10% उन परिस्थितियों से निर्धारित होता है जो हमें घेरे हुए हैं और शेष 40% हर दिन हमारे द्वारा की जाने वाली गतिविधियों से शुरू होता है। इस प्रकार 40% हमारे मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होता है और हमारा मस्तिष्क हमारी सोच के द्वारा, सोच हमारे सोचने के ढंग यानी सकारात्मकता और नकारात्मकता के द्वारा, मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य को खुश होने के लिए संसाधनों की नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं को, इंद्रियों को काबू करने की जरूरत है लेकिन हम ठहरे कलयुगी मानुष भला इच्छायें तो मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ती। मनोवैज्ञानिक शोध के अनुसार भविष्य की इच्छाओं की पूर्ति के चक्कर में अधिकतर लोग अपने आज को यानी वर्तमान को पूरी तरह खत्म कर लेते हैं। वे जितना कमाते हैं उसे भविष्य के लिए जमा करने पर अपना पूरा जीवन लगा देते हैं और इस दौरान उनका अपने वर्तमान जीवन पर यह कथन होता है या अक्सर बुदबुदाते हुए कहते हैं कि उनके जीवन में संसाधनों और धन का बेहद अभाव है। उनके पास तो खुश रहने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। जिसके लिए वे खुश रहें। यह पहलू कहीं ना कहीं आप, मैं और हम सब पर भी लागू होता है। मनोविज्ञान कहता है कि जैसा हम सोचते हैं हमारे आसपास का वातावरण भी ठीक वैसा ही हो जाता है। सकारात्मक सोचेंगे तो सकारात्मक और नकारात्मक सोचेंगे तो नकारात्मक। नकारात्मक सोच वाले लोग हमेशा “यह पर्याप्त नहीं है” और “हमेशा हमेशा कुछ बेहतर होगा” पर आधारित विचार में रहते हैं। नकारात्मक सोच कहीं ना कहीं हमें समस्याएं और दुख ही दिखाती है। नकारात्मक सोच समस्याओं का समाधान नहीं दिखाती। नकारात्मकता से ही चिंता और यह चिंता कुछ समय बाद डिप्रेशन बन जाती है। डिप्रेशन कई मनोरोगों से व्यक्ति को घेर लेता है और व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार होने के साथ-साथ शारीरिक रूप से भी बीमार हो जाता है। यह वह अवस्था है। जिसका कारण हमारी नकारात्मक सोच और नकारात्मक वातावरण है। जो हमने खुद चुना है। वहीं जब हम हर परिस्थिति में सकारात्मक सोचने की ठान लेते हैं तो कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों ना हो उसका जल्द ही समाधान खोज लेते हैं। सुखद जीवन की कुछ कमियां हैं। उदाहरण के लिए, हम जल्दी से सुखों के अभ्यस्त हो जाते हैं और यह हमें एक निरंतर खोज की ओर ले जाता है जिसका खुशी के साथ बहुत कम संबंध है। सकारात्मक परिस्थिति ही हमें आगे की राह प्रशस्त करती है। सकारात्मक मनोविज्ञान केवल एक सिद्धांत नहीं है, इसके वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो इसका समर्थन करते हैं।
बेशक जीवन में कितने ही संसाधनों या पैसे का अभाव हो लेकिन अगर हमारी सोच सकारात्मक होगी तो हम जीवन में कुछ न कुछ ऐसा जरूर कर जाएंगे जो हमारे सपनों को उड़ान देने जैसा होगा। तब हमें अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं होगी क्योंकि शिकायतों को सकारात्मकता के साथ समाधान करने की काबिलियत परिस्थितियों के ऊपर विजय दिलाने का कार्य करेगी। वही सही मायनों में जीवन का सार होगा। जिसमें कोई व्यक्ति कुछ पाने के लिए किस्मत को दोष देने की बजाय कर्म प्रधानता के साथ अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व लगा देगा। जब उसे सब मेहनत से मिलेगा तब उसे संतुष्टि और खुशी का जो भाव पैदा होगा वही अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।…………………………..

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