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Sunday, October 24, 2021

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कोरोना काल में जान गंवाने वाले पत्रकाराें के परिवारी-जनों को मिलनी चाहिए आर्थिक मदद: डॉ एमपी सिंह

फरीदाबाद (नेशनल प्रहरी/ रघुबीर सिंह ): हिंदी पत्रकारिता दिवस की बधाई देते हुए देश के सुप्रसिद्ध शिक्षाविद समाजशास्त्री दार्शनिक प्रोफेसर एमपी सिंह ने कहा कि पत्रकार रोज का इतिहास अखबार के पन्नों में समाहित कर के लोगों तक पहुंचाते है ऊपरी तौर पर उनका काम सभी को आसान लगता है लेकिन बहुत मुश्किल होता है। अनेकों प्रकार के दबाव प्रभाव व अभावों को झेलना पड़ता है खबर प्रकाशित करते समय अपने आप से लड़ना पड़ता है क्या सही है क्या गलत है क्या लिखूं क्या न लिखूं अनेकों प्रकार के द्वंद को झेलना होता है जब कहीं एक खबर तैयार होती है। कई बार सच का साथ देने पर मौत को भी गले लगाना पड़ता है पूरी स्वतंत्रता के बावजूद भी पत्रकारिता सामाजिक और नैतिक मूल्यों से जुड़ी रहती है। उदाहरण के तौर पर सांप्रदायिक दंगों का समाचार लिखते समय पत्रकार प्रयास करता है कि उसके समाचार से आग न भड़के लेकिन संभावनाओं का क्षेत्र है कुछ भी संभव है।
अनेकों पुस्तकों के लेखक और साहित्यकार डॉ एमपी सिंह ने कहा कि पत्रकार सच्चाई जानते हुए भी दंगों में मारे गए आंकड़ों को ठीक से नहीं दर्शा पाते है बलात्कार के मामले में महिला का नाम व चित्र भी उजागर नहीं कर पाते है क्योंकि कहीं ना कहीं सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। सभी लोग पत्रकार से उम्मीद करते हैं कि आचार संहिता का पालन करें लेकिन साथ और सहयोग देने वाले बहुत कम होते हैं।
डॉ एमपी सिंह ने सभी से अपील की है कि बिना ठोस सबूतों के किसी समाचार को प्रकार प्रकाशित नहीं करना चाहिए और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए किसी भी खबर को लिखने से पहले उसके पूरे तथ्यों की जांच और परख कर लेनी चाहिए तथा किसी के बयानों को तोड़ना मरोड़ना नहीं चाहिए पत्रकार को अपनी निजी राय भी प्रकाशित नहीं करनी चाहिए शब्दों की जादूगरी तो होनी चाहिए लेकिन समाचार में स्पष्टता और संतुलन बनाए रखना चाहिए। समाचार मैं भ्रम और अफवाह नहीं सोनी चाहिए।
डॉ एमपी सिंह ने कहा कि आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक हिंदी पत्रकारिता का विशेष योगदान रहा है वर्तमान परिपेक्ष में पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं। डॉ एमपी सिंह ने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर में देशभर में कई पत्रकार ड्यूटी के दौरान कोरोना से संक्रमित हो गए और उन्होंने अपनी जान गवा दी ऐसी स्थिति में उनके परिवारी जनों को आर्थिक मदद मिलनी चाहिए ताकि अन्य पत्रकार भी अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सके। इस कोरोना काल में जब अधिकतर लोग घर से निकलने में डर रहे थे तब पत्रकार साथी कोरोना योद्धा के रूप में काम कर रहे थे। सरकार के दिशा निर्देशों की पालना करते हुए जरूरतमंदों की मदद कर रहे थे और सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने में अपना अहम योगदान दे रहे थे।

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