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Thursday, September 16, 2021

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खुशी का मनोविज्ञान…….

प्रदीप दलाल की कलम से……
एक दोस्त ने पूछा खुशी का मनोविज्ञान क्या है और आखिर किस प्रकार खुश रहा जा सकता है। दरअसल, खुशी का मनोविज्ञान कुछ अलग ढंग से काम करता है और वह अलग-अलग व्यक्ति का अलग-अलग होता है। खुश रहना एक समाज-मनोवैज्ञानिक क्रिया है। अनुभव बताते हैं कि कुछ लोग सबकुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद खुश नहीं रहते हैं। कुछ के लिए धनवान होना खुशी है तो कुछ के लिए मान सम्मान, तो कुछ के लिए पारिवारिक सुख, कुछ के लिए शिक्षा यानी ज्ञान। कुछ के लिए नौकरी तो कुछ के लिए हमारे आसपास का सामाजिक मनोवैज्ञानिक माहौल। मेरे हिसाब से हमारे आसपास का सामाजिक मनोवैज्ञानिक माहौल ही हमारी खुशी और दुख का पैमाना होता है जो कि निर्धारित करता है कि व्यक्ति का व्यवहार कैसा होगा। इस तरह के माहौल में कुछ चीजें बेहद कारगर होती हैं। जिनमें किसी से किसी भी तरह की उम्मीद ना करना। ड्रॉलबलोग आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह कभी खरे उतर ही नहीं पाएंगे क्योंकि कहने और करने में जमीन आसमान का अंतर होता है और वही अंतर कहीं ना कहीं खुशी को गम में तब्दील करने के लिए भी काफी होता है। जब किसी से उम्मीद नहीं होगी तो हम वही करेंगे जो हम खुद कर सकते हैं यानी कि जिसके लिए हमें किसी की सहायता की जरूरत ही ना हो। इससे उम्मीदों या सपनों के टूटने का खतरा बेहद कम हो जाता है। इसके लिए सबसे पहले स्वयं पर विश्वास करना होगा कि जब हम स्वयं सब कुछ कर सकते हैं तो दूसरों से उम्मीद क्यों रखें और अगर रखें भी तो अपने मन को इतना मजबूत करें कि उम्मीद टूटने पर अपने आप को पीड़ा की स्थिति में न ले जाएं। इसके अलावा खुशी के मनोविज्ञान में जो कार्य आपको अच्छा लगता है वही करें न कि वह कार्य है जो कि हालातों ने आप को जबरदस्ती थमा दिया है क्योंकि ऐसा करके शायद कुछ समय के लिए अधिक धन जरूर अर्जित कर लेंगे लेकिन कहीं ना कहीं मन में एक टीस जरूर रहेगी जो की उम्र भर मन को कचोटती रहेगी। दरअसल हमारा जीवन एक सफर की तरह है और यह सफर है खुशी की तलाश का जो कि हर कोई तलाश लेना चाहता है। दरअसल, हमेशा मुस्कुराते रहना खुशी नहीं है। खराब मूड को अच्छा कर लेना भी खुशी नहीं है। खुशी है, प्रसन्नता के सबसे उम्दा पलों में चेहरे पर खिला संतु़ष्टि का भाव। दरअसल, खुशी पर्याय है अर्थपूर्ण जीवन का, जो सिखाता है वक्त की अहमियत, मंजिल का महत्व, यह भी कि यह जीवन है सोच और उम्मीदों से भरा हुआ। यकीनन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके नसीब में खुशी लिखी होती है। वे जन्म के साथ ही खुशियां लेकर आते हैं। वे ऐसी जगहों पर भी बड़ी आसानी से खूबसूरती और उम्मीद तलाश लेते हैं, जहां औरों को सिर्फ खामियां और नाउम्मीदी नजर आती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि दूसरे किस्म के लोग हमेशा ही ऐसे रहते हैं। वे खुद को बदल सकते हैं। अगर वे कोशिश करें तो अपने भीतर छिपे खौफ और नकारात्मक सोच को चुनौती दे सकते हैं। अपने डर को ताकत में बदलना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके लिए बस, नकारात्मक सोच को सकारात्मक वाक्य में पिरो देना है। मसलन, अगर आप यह कहते हैं कि ‘मैं हमेशा हारूंगा’, तो उसकी जगह कहिए, ‘मैं जीत सकता हूं’। धीरे-धीरे खुशी मिलने लगेगी। मनचाही चीज पाने से ही नहीं मिल जाती खुशी कई लोगों को लगता है कि वे लॉटरी या कोई बड़ी रकम जीत लें, तो उन्हें खुशी हासिल हो जाएगी या अगर उनकी कोई अनमोल चीज खो जाए तो उनकी जिंदगी की सारी खुशियां छिन जाएंगी। याद रखिए, हम इंसानों में परिस्थितियों में ढलने की अद्भुत क्षमता होती है। कुछ भी हो जाए, जल्द ही हम अपनी खुशी वापस पा लेते हैं। दरअसल, हमारी अनुकूलनशीलता या ढलने की क्षमता दो दिशाओं में काम करती है। क्योंकि हम बेहद अनुकूलनशील होते हैं, इसलिए हम जॉब पाने से लेकर शादी करने जैसी तमाम उपलब्धियों के आदी हो जाते हैं। कोई बेमिसाल उपलब्धि हासिल करने के बाद जल्द ही हमें फिर से अधूरापन सालने लगता है। हम अपनी महत्वाकांक्षाओं का स्तर बढ़ा देते हैं और ऊंचे सपने संजोते हैं। ऐसे में, खुशी हमेशा हमारी पहुंच से दूर रहती है। हमेशा एक कदम दूर। खुशी का हिस्स है दर्द दर्द से बचने का तोहफा नहीं है खुशी। इसके लिए हमेशा नकारात्मक सोच से लड़ना होता है, एक पल को भी उन्हें खुद पर हावी नहीं होने देना होता। खुशी के लिए गम का होना बेहद जरूरी है, तभी हमें खुशी की अहमियत पता चलती है। अपने करीबी लोगों के लिए दुख से पता चलता है कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं और रिश्ता कितना मजबूत है। नौकरी में आने वाली उलझनें बताती हैं कि हम सही राह पर हैं या गलत। इसलिए, अगर गम न हों, तो खुशी के मायने भी नहीं होंगे। यही वजह है कि बिना अंधेरे के रोशनी का कोई महत्व नहीं। अहसासों को समझना जरूरी खुशी को महसूस करने के लिए जरूरी है कि हम हमेशा अपने अहसासों को समझने की कोशिश करें, न कि हमेशा उनसे अपने फैसलों को प्रभावित होने दें। इसकी आदत डाल लें, तो खुशी हासिल करने का यह बेहद शक्तिशाली जरिया हो सकता है। परिणाम यह हो रहा है कि व्यक्ति अनचाहे और अनजाने तनावों को दिल-दिमाग में ढोता हुआ एक अभिशप्त-सा जीवन जी रहा है। हम निरर्थक और निरुद्देश्य-सी सूचनाओं और संपर्कों में उलझ गए हैं जिनका हमारे जीवन से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक नहीं है। हमारे तनावों और मानसिक दबावों का अधिकांश हिस्सा ऐसी ही सूचनाओं और संपर्कों से आयातित है जिसकी हमारे जीवन में न कोई उपादेयता है न ही प्रासंगिकता। हमें प्रसन्नचित् रहने के लिए निरर्थक सूचनाओं और संपर्कों को चिन्हित कर छंटनी करने की स्वचालित पद्धति का अभ्यास करना होगा जो ऑटोमोड में हमें इनसे दूर रखे। दरअसल हमें खुशी ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है बल्कि इसके लिए हमें खुद को तैयार करना होगा और खुशी की परिभाषा को अपने अनुसार गढ़ना होगा। अपने आप को समय देना और ऐसा समय जिसमें हम हर वह पागलपन करें जो हम करना चाहते हैं बिना यह परवाह किए कि कोई देख कर क्या सोचेगा या कैसा महसूस करेगा। अपने आप को दिया हुआ समय हमें खुशी के बेहद पास ले जाएगा और हम आत्म संतुष्टि के उच्च शिखर पर होंगे कि हम जब नीचे देखेंगे तो हमें बड़े-बड़े गम भी नजर नहीं आएंगे क्योंकि संतुष्टि ही प्रसन्नता का द्वार है और वर्तमान समय में हमें खुशी से जीने के लिए उस द्वार को खोलना होगा…….

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