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Sunday, September 19, 2021

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दिक्षेन्द्र आर्य ने सन्यास दीक्षा ग्रहण कर पूरा जीवन किया आर्यसमाज को समर्पित, अब जाने जाएंगे स्वामी आदित्यवेश के रूप में

चंडीगढ़ (नेशनल प्रहरी/ संवाददाता) : जब कोई समाज और देशसेवा को अपना लक्ष्य बना लेता है तो वह मानव नहीं अपितु महामानव कहलाता है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाकर वर्षों से जागरूकता की अलख जगा रहे ब्रह्मचारी दिक्षेन्द्र आर्य अब सन्यास दीक्षा ग्रहण करने के बाद स्वामी आदित्यवेश कहलाएंगे। उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन को समाज और देशहित में आहूत करने का संकल्प लिया है।
स्वामी आदित्यवेश ने अपने जीवन में आर्य समाज के रास्ते पर चलने की दीक्षा लेकर अपने जीवन को आर्य समाज के पथिक मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। उन्हें सन्यास दीक्षा अपने गुरु व सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान स्वामी आर्यवेश जी ने दिलाई। संन्यास लेने पर नामकरण संस्कार किया गया। जो कि दीक्षेन्द्र आर्य जी के नाम से जाने जाते थे । बल्कि आज से स्वामी आदित्यवेश जी के नाम से जाने जाएंगे। सार्वदेशिक आर्य युवक परिषद हरियाणा के प्रधान, हजारों युवाओं के मार्ग दर्शक, मिशन आर्यावर्त के डायरेक्टर समेत वे कई जिम्मेदारियों का वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से कर चुके हैं।
कौन हैं स्वामी आदित्यवेश : स्वामी आदित्यवेश पूर्व में दिक्षेन्द्र आर्य के रूप में आर्य समाज का वो नवयुवक जो निरंतर आर्य समाज को नये आयाम देने के लिये प्रयासरत है। सोशल मिडिया पर दिक्षेंद्र आर्य की मिशन आर्यवर्त की पहल अपने आप में एक बहुत्रत बड़ी मिशाल है। जिसके बारे पहले कभी किसी ने सोचा भी नहीं था। इसके पीछे आर्य एकता का उनका भाव सभी को प्रभावित करता है। जब वो पढ़ते थे उनका बौद्धिक स्तर अपने आप में अनोखा था। परन्तु जिनको देश धर्म जाति के लिये कुछ करना होता है वो अलग ही चलते है। जगबीर सिंह एडवोकेट(स्वामी आर्यवेश जी) से प्रेरित होकर आर्य समाज में दीक्षित हुए और इतना समर्पित हो गए के अपना पूरा कैरियर ही बदल लिया। एक डॉक्टर के घर पैदा हुए स्वामी दिक्षेंद्र ने पहले अपनी नॉन मेडिकल की पढाई छोड़ कर आर्य समाज की7 गतिविधियों में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया और जब रंग आर्य समाज का लगा तो हरियाणा की क्रिकेट टीम को छोड़ कर अधिकतम समय आर्य समाज में लगाने लगे। अपनी एम ए की पढाई पूरी करने के बाद 26 जून 2006 को अपनी पूरी जिंदगी आर्य समाज में लगाने का निर्णय लिया और दीक्षा के पश्चात अपना नाम बदल कर दिक्षेंद्र आर्य बन गये।
सामाजिक जीवन की सुरुवात 1996 में शहीद भगत सिंह युवा परिषद् खटकड़ के गठन करके की वो अध्यक्ष बने व गावँ में एक आदर्श माहौल सबके साथ मिलकर बनाया। जिसके कारन सभी ग्राम वासी पहले से उनको एक संयासी की तरह मानते थे। आपने ही गावँ में जहाँ युवा परिषद् के बहुत सुंदर भवन का निर्माण करवाया वहीँ शहीद भगत सिंह व्यायाम शाला की स्थापना भी की। जिसके माध्यम से अब तक गावं के लगभग 50 नवयुवक आर्मी व पुलिस में भर्ती हो चुके हैं। लगभग 350 युवा निर्माण शिविरों में स्वयं प्रशिक्षण दिया है।
आपके द्वारा लिखित पुस्तक”” योग आपके लिए”‘ भारत के अलावा विदेशों में भी काफी पसंद की गई है। कुम्भ मेल 2010 में आयोजित पाखंड खंडन कार्यक्रम व 40 दिवसीय शिविर का संयोजन भी किया।
इसके अतिरिक्त 8 राज्यों की वेद प्रचार यात्रा का संयोजन किया तथा 5 प्रांतीय जन चेतना यात्राओं की भी मुख्य जिम्मेदारी भी आपने संभाली ।
अब तक 11 चतुर्वेद पारायण यज्ञों के संयोजन में भी महतवपूर्ण भूमिका बखूबी कर चुके हैं उसके अतिरिक्त आर्य समाज में एक एक हजार नवयुवकों के शिविर लगाने की नई परम्परा शुरू की और उन लोगों को जो कहते थे की आर्य समाज में नव युवक नहीं आते उनको बता दिया के आप के पुरुसार्थ से सब संभव है। आज हजारों नोजवान आपको अपना आदर्श मानते हैं। आपकी विशेष कार्यशैली व समर्पण सहज में सबको प्रभावित करता है।
आपने जहाँ देश के कोने कोने में जाकर प्रचार किया है वहीँ आपकी काबिलयत इस बात से भी साबित होती है के आप अब तक दो बार दक्षिण अफ्रीका के अतरिक्त जर्मनी, हॉलैंड, फ़्रांस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम आदि देशों में भी वेद प्रचार के लिए बुलाये जा चुके हैं। सभी के साथ आत्मीय सम्बन्ध सबको अपना बना लेता है। जो ऋषि दयानंद के मिशन में एक बहुत बड़ा कार्य है। आपकी प्रेरणा से आज युवा आर्य समाज के कार्यों से जुड़ रहे हैं। आज सोशल मीडिया पर विशेष कार्यक्रम ही पूरे विश्व में आर्यसमाज की गतिविधियोंं से जोड़ने का काम करते हैं।

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